Chhath Nahay Khay

Date - 24 October 2017

Tuesday

Chhath Kharna

Date - 25 October 2017

Wednesday

Chhath Sandhya Argh

Date - 26 October 2017

Chhath Evening Argh Time - 5:41 PM
Thursday, October 26, 2017 (IST)

Sunset in Mukund Vihar, Mukundpur, Delhi, India

Chhath Morning Argh

Date - 27 October 2017

Chhath Morning Argh Time - 6:30 AM
Friday, October 27, 2017 (IST)
Sunrise in Mukund Vihar, Mukundpur, Delhi, India

Ganesh Chaturthi 2017

Ganesh Chaturthi 2017 will begin on
Friday, 25 August
and ends on
Tuesday, 5 September
गणेश चतुर्थी
 
गणेश चतुर्थी का त्यौहार बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है | यह त्यौहार भारत के विभिन्न भागो में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है | लेकिन महाराष्ट राज्य में यह त्यौहार और भी धूमधाम से मनाया जाता है | पुराणों और ग्रंथो के अनुसार इस दिन यानी चतुर्थी के दिन गणेश जी का जन्म हुआ था | गणेश चतुर्थी के दिन सभी भक्त बड़ी ही श्रद्धा से पूजा -अर्चना करते है | गणेश चतुर्थी के दिन विभिन्न जगहों में तथा घरो में गणेश जी की मूर्ती स्थापित की जाती है | और उसे पूरे नौ दिन तक बड़े ही श्रद्धा भाव से पूजा जाता है | गणेश जी के दर्शन करने के लिए भारी संख्या में आस -पास के लोग इकट्ठा होते है | नौ दिन पूरे होने  के बाद गाने -बाजे और ढोल -नगाड़ो के साथ गणेश जी की प्रतिमा को तालाब में विसर्जित कर  दिया जाता है |
 
गणेश चतुर्थी की कथाये
एक बार माता पार्वती स्नान करने गयी तो उन्होंने  स्नान करने से पूर्व उपटन लगाया और उस उपटन के  मैल से एक बालक की प्रतिमा बनाकर   उसे अपना द्वारपाल बना दिया। शिवजी जब प्रवेश कर रहे थे  तब बालक ने उन्हें रोक दिया।शिवगणो ने जब यह देखा  की एक बालक ने शिवजी का अपमान किया है तो उनसे यह देखा न गया और उन्होंने  बालक से भयंकर युद्ध किया परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया। इससे माता पार्वती क्रोधित हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली। भयभीत देवताओं ने देवर्षिनारद की सलाह पर माता की  स्तुति कर तथा भगवान शंकर के ये कहने की वह उस बालक को पुनर्जीवित कर देंगे इससे माता पार्वती को  शांत किया। शिवजी के निर्देश पर विष्णुजी उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुखबालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्यहोने का वरदान दिया। भगवान शंकर ने बालक से कहा-गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा।
 
गणेश चौथ की कथा
 
गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रदर्शन करना मना  होता है क्योकि कहते है की श्री कृष्ण ने चौथ का चाँद देख लिया था  जिस कारण उनपर मणि चुराने का आरोप लगा था | एक बार जरासंध के भय से श्रीकृष्ण समुद्र के बीच नगरी बसाकर रहने लगे। इस नगरी को द्वारिकापुरी के नाम से जाना जाता है । द्वारिकापुरी में सत्राजित यादव नाम का राजा रहता था जिसने सूर्य देव की आराधना की।  जिससे सूर्य देव प्रसन्न हो गए तब भगवान सूर्य ने उसे नित्य आठ भार सोना देने वाली स्यमन्तक नामक मणि अपने गले से उतारकर दे दी।  मणि पाकर सत्राजित  बहुत प्रसन्न हुआ और  जब  वह नगरी में गया तो सब उसकी मणि को ही देख रहे थे  | श्रीकृष्ण ने उस मणि को देखा और उसे प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। सत्राजित ने वह मणि श्रीकृष्ण को देने से इनकार कर दिया और अपने भाई  प्रसेनजित को दे दी। एक दिन प्रसेनजित घोड़े पर बैठकर शिकार के लिए गया। वहां पर एक  शेर था जिसने  उसे मार डाला और मणि ले ली। रीछों का राजा जामवन्त उस सिंह को मारकर मणि लेकर गुफा में चला गया।  जब प्रसेनजित  कई दिनों तक शिकार से नहीं  लौटे तो सत्राजित को बहुत दुख हुआ।और उन्होंने  सोचा की श्रीकृष्ण ने  मणि प्राप्त करने के लिए उसके भाई प्रसेनजित का वध कर दिया । अतः उसने बिना सत्य को जाने नगर  में प्रचार कर दिया की श्री कृष्ण ने उसके भाई को मरकर स्यमन्तक मणि छीन ली | इस निंदा के निवारण हेतु  श्रीकृष्ण  प्रसेनजित को ढूंढने वन में गए। वहां पर प्रसेनजित को शेर द्वारा मार डालना और शेर को रीछ द्वारा मारने के चिह्न उन्हें मिल गए।
रीछ के पैरों के निशान का पीछा  करते-करते वे जामवन्त की गुफा में पहुंचे और गुफा के भीतर चले गए।  और वहां उन्होंने देखा कि पलने में एक बच्ची  लेती है और उसके हाथो में मणि है जिसे वह खिलौना समझ कर खेल रही है |
जामवन्त ने श्रीकृष्ण को देखते ही  युद्ध छेड़ दिया | श्रीकृष्ण के साथी जो उनके साथ गए थे वो गुफा के बाहर ही श्री कृष्ण की प्रतिक्षा कर रहे थे जब श्री कृष्ण   सात दिनों तक वापस नहीं लौटे तो उनके साथियो ने उन्हें मरा  हुआ जानकर वापस द्वारिकापुरी को लौट गए।गुफा के अंदर लगातार इक्कीस दिन तक युद्ध चला लेकिन इतने दिनों तक युद्ध करने के बाद भी जामवन्त श्री कृष्ण को पराजित न कर सका।तब उसके मन में विचार आया की कहीं यह वह अवतार तो नहीं है   जिसके लिए मुझे श्री  रामचंद्रजी का वरदान मिला था।इस बात की पुष्टि हो जाने पर उसने अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में दे दी। जब श्रीकृष्ण  मणि लेकर वापस आए तो सत्राजित को अपने किए पर बहुत लज्जा आई  तथा  पछतावा  हुआ। इस लज्जा से मुक्त होने के लिए उसने अपनी पुत्री सत्यभामा  का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।कुछ समय व्यतीत होने के बाद श्रीकृष्णको  किसी काम से इंद्रप्रस्थ जाना पड़ा |  तब ऋतु वर्मा तथा अक्रूर के कहने पर शतधन्वा यादव ने सत्राजित को मार दिया और मणि अपने कब्जे में ले ली।जब  सत्राजित की मृत्यु  का समाचार  श्रीकृष्ण को मिला तो  वे तत्काल द्वारिका पहुंचे।जब शतधन्वा को यह बात पता चली की श्री कृष्ण और बलराम उसे मारने के लिए तैयार हो गए है तो शतधन्वा ने मणि अक्रूर को दे दी और स्वयं भाग निकला। श्रीकृष्ण नेशतधन्वा को ढूढ़ लिया और उसे मार दिया पर मणि को हासिल नहीं कर पाए | 

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