कुंभ मेला 2018

Bathing Dates of Magh Mela 2018
Paush Purnima - 02 January 2018
Makar Sankranti - 14 January 2018
Mauni Amavasya - 16 January 2018
Basant Panchami - 22 January 2018
Maghi Poornima - 31 January 2018
Maha Shivratri - 13 February 2018


Bathing Dates of Ardh Kumbh Mela 2019
Makar Sankranti (1St shahi Snan) - 14/15 January 2019
Paush Purnima - 21 January 2019
Mauni Amavasya (Main Royal Bath 2nd Shahi Snan) - 04 February 2019
Basant Panchami (3rd shahi Snan) - 10 February 2019
Maghi Poornima - 19 February 2019
Maha Shivratri - 04 March 2019

कुंभ पर्व का आयोजन
 
कुम्भ पर्व के आयोजन के लिए सबसे प्रचलित कथा है देव औरदैत्यों के बीच जो समुद्र मंथन हुआ था | इस कथा के अनुसार जब महर्षि दुर्वासा ऋषि के श्राप  के कारण इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए थे | और दानवों  ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के कहने पर सभी देवता गण दानवों के साथ मिलकर अमृत निकालने के लिए तैयार हो गए | जैसे ही अमृत कलश समुद्र से बाहर निकला तो देवताओं के संकेत करने पर देवराज इंद्र का पुत्र जयंत अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ गया | उसके बाद दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने दैत्यों को अमृत कलश को वापस लाने का आदेश दिया | इसके बाद दानवो ने जयंत का पीछा किया और कठिन परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ लिया | उसके बाद अमृत कलश पर अपना-अपना अधिकार स्थापित करने के लिए देवों और दानवों के बीच बारह दिनों तक लगातार बिना रुके युद्ध होता रहा |
इस युद्ध  के दौरान  पृथ्वी के चार स्थानों इलाहाबाद ( प्रयाग ),हरिद्वार, उज्जैन, नासिकपर अमृत कलश से अमृत की कुछ बूँदें गिरी थीं |  उस समय चंद्रमा ने कलश से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने कलश के  फूटने से, गुरु ने दानवों  के अपहरण से एवं शनि देव  ने इंद्र  के भय से कलश की रक्षा की। कलेश शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण करके ( देव और दानवों ) सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव और दानव के बीच हो रहे युद्ध का अंत हो गया।
 
अमृत प्राप्त करने के लिए देवो और दानवों के अविराम बारह दिनों तक युद्ध हुआ था | मनुष्यों के बारह वर्ष देवताओं के बारह दिनों के बराबर होते है | इसीलिए कुंभ भी बारह होते हैं। इनमे से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और बाकि के आठ कुंभ देवलोक में होते हैं | जिसे देवतागण ही प्राप्त कर सकते है मनुष्य वहाँ नहीं पहुंच सकता | जिस समय में चंद्रमा ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।
 
कुंभ मेला इतिहास
 
कुंभ मेले का इतिहास लगभग आठ सौ पचास ( 850 ) साल पुराना है। यह माना जाता है कि आदि शंकराचार्य कुंभ मेले की शुरुआत की थी, लेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही हो गई थी।समुद्र मंथन में निकले अमृत कलश से अमृत की कुछ बूँदें हरिद्वार, इलाहबाद, उज्जैन और नासिक इन चार स्थानों पर गिरी थी | इसीलिए इन चार स्थानों पर ही कुंभ मेला हर तीन बरस बाद लगता आया है। बारह वर्ष बाद यह मेला अपने पहले स्थान पर वापस पहुंचता है।कुछ पुरातत्व से पता चलता है कि कुंभ मेला 525 बीसी में शुरू हुआ था।महा कुंभ मेले के आयोजन का प्रावधान कब से है इस विषय के बारे विद्वानों के अलग - अलग मत है | पहले ( वैदिक और पौराणिक काल ) में कुंभ तथा अर्ध  कुंभ स्नान में आज जैसी प्रशासनिक व्यवस्था का  नहीं थी । कुछ विद्वानों का कहना है की गुप्त काल में कुंभ स्नान की व्यवस्था सुव्यवस्थित थी | लेकिन  प्रमाणित तथ्य सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन( 617-647 ई. ) के समय से प्राप्त होते हैं।इसके बाद में जगतगुरु शंकराचार्य तथा उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने दसनामी संन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था की थी |
 

 

शरद नवरात्रे

Pratipada (Navratri Day 1)     Wednesday     10 October 2018
Dwitiya (Navratri Day 2)     Thursday     11 October 2018
Tritiya (Navratri Day 3)     Friday     12 October 2018
Chaturthi (Navratri Day 4)     Saturday     13 October 2018
Panchami (Navratri Day 6)     Sunday     14 October 2018
Sasthi (Navratri Day 6)     Monday     15 October 2018
Saptami (Navratri Day 7)     Tuesday     16 October 2018
Ashtami (Navratri Day 8)     Wednesday     17 October 2018
Navami (Navratri Day 9)     Thursday     18 October 2018

२१ सितम्बर २०१७ - प्रथमं  -  शैलपुत्री
२२ सितम्बर २०१७ - द्वितीया -  ब्रह्मचारिणी
२३ सितम्बर २०१७ - तृतीया - चंद्रघंटा
२४ सितम्बर २०१७ - चतुर्थी - कूष्माण्डा
२५ सितम्बर २०१७ - पंचमी - स्कंदमाता
२६ सितम्बर २०१७ - षष्ठी  - कात्यायनी
२७ सितम्बर २०१७ - सप्तमी - कालरात्रि
२८ सितम्बर २०१७ - अस्टमी - महागौरी
२९ सितम्बर २०१७ - नवमीं - सिद्धिदात्री
३० सितम्बर २०१७ - दशमी - विजयदशमी (दुर्गा विसर्जन )
 
ब्रस्पतिवार २१ सितम्बर २०१७
माता शैलपुत्री

माँ दुर्गा के नौ रूप होते है उनमे से प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री का है | नवरात्री के पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है | माता शैलपुत्री का नाम शैलपुत्री हिमालय  के घर जन्म लेने के कारण  पड़ा इन्हे सती के नाम से भी पुकारा जाता है |
 
शैलपुत्री का वाहन - वृषभ है |
इनका दूसरा नाम - वृषारूढ़ा है |
दाहिने हाथ में - त्रिशूल है |
बाहिने हाथ में - कमल है |
 
शैलपुत्री की कथा

एक समय की बात है जब दक्ष प्रजापति ने यज्ञ रखा तो उस यज्ञ में सारे देवी देवताओं को निमंत्रित किया गया , लेकिन भगवान शंकर और माता पार्वती को यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया गया। लेकिन सती जी यज्ञ में जाने के लिए तैयार हो गई । शंकरजी ने माता पार्वती को बहुत समझाया की वहाँ मत जाओ  हमे निमंत्रित नहीं किया है इसलिए  ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है | सती जी के बार - बार आग्रह करने पर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब अपने घर पहुंचीं जहाँ यज्ञ हो रहा था तो उनकी  मां ने उन्हें स्नेह दिया।  और उनकी बहनों ने भी उन्हें स्नेह दिया सिर्फ माता सती के पिता दक्ष प्रजापति ने ही माता सती को स्नेह नही किया | दक्ष ने भगवान शंकर को लेकर बहुत ही कड़वे वचन बोले और माता सती को भी अपमानजनक शब्द कहे जो माता सती को सहन नहीं हुए | माता सती से अपने पति यानि की  भगवान शंकर का अपमान उनसे सहा नहीं गया और वो क्रोधित हो उठी क्रोध में उन्होंने अपने - आप को योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर लिया। इस  दुख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने अपनी जटा से वीरभद्र को उत्पन्न किया और उसने यज्ञ का विध्वंस  कर दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिवजी की अर्द्धांगिनी बनीं।
 
शैलपुत्री मन्त्र
वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌।
 वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥
 
शुक्रवार २२ सितम्बर २०१७
 माता ब्रह्मचारिणी

भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए इन्होंने घोर तपस्या की थी इसी लिए इनको माता ब्रह्मचारिणी के नाम से पुकारा जाता है |
माता ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ - में जप करने की माला है
माता ब्रह्मचारिणी के बाहिने हाथ - में कमण्डल है
माता ब्रह्मचरिणी का दूसरा नाम - अपर्णा है
 
माता ब्रह्मचारिणी की कथा

अपने पिछले जन्म में इन्होने शंकर जी को पाने के लिए नारद जी के कहने पर घोर तप किया था | एक हजार वर्ष तक इन्होने केवल फल - फूल खाकर अपना जीवन व्यतीत किया और सौ वर्ष तक जमीन पर रहकर पत्तो पर निर्वाह किया | काफी दिनों तक कठोर उपवास रखे ,तेज धूप और वर्षा में रहकर अत्यंत दुःख और पीड़ा सही | कहते है की माता ने तीन हजार सालो तक केवल बेल के सूखे पत्तो का सेवन किया और निरंतर भगवान शिव की आराधना करती रही | कुछ समय बाद तो इन्होने सूखे पत्ते खाना भी बंद कर दिया और निर्जलऔर बिना आहार के तप करने लगी|  पत्तो का सेवन छोड़ देने पर इनका नाम अपर्णा पड़ा | निराहार तप करने के कारण माता का शरीर क्षीण हो गया |
सभी देवी देवताओ ने , ऋषि मुनिओ ने ,सिद्धगणों ने माता ब्रह्मचारिणी की तपस्या की बहुत सराहना की और कहा  की ऐसा तप कोई और नहीं कर सकता ये सिर्फ आपसे ही संभव था | उन्होंने कहा की अब आप घर लौट जाइये आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी और आपको शिव शंभू पति के रूप में अवश्य मिलेंगे | आपके पिता आपको लेने आ रहे है | माता ब्रह्मचारिणी की आराधना करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है | इस कथा का निष्कर्ष यही है की कितनी भी मुश्किलें क्यों न आ जाए जीवन में लेकिन मन को विचलित मत होने देना |
 
माता ब्रह्मचारिणी मंत्र
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
 
शनिवार २३ सितम्बर २०१७
माता चंद्रघंटा

नवरात्री के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा - अर्चना की जाती है |
माता चंद्रघंटा के ललाट में - घंटे जैसा आधा चंद्रमा सुशोभित है |
इनका शरीर का रंग  - सोने जैसा चमकीला है |
इनका वाहन - सिंह है |
इनकी भुजाएँ - दस है |
माता चंद्रघंटा के हाथो में तलवार और अनेक अस्त्र-शस्त्र है इसीलिए उनकी इस प्रकार की मुद्रा युद्ध  के लिए उद्धत रहने की है।माता चंद्रघंटा की आराधना करने से वीरता और निर्भयता के साथ ,सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है।माता चंद्रघंटा का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है |
 
माता चंद्रघंटा मंत्र
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥
 
रविवार २४ सितम्बर २०१७
माता कूष्माण्डा

नवरात्रि में चतुर्थी के दिन माता कुष्मांडा की पूजा -अर्चना की जाती है | अपनी धीमी सी मुस्कान और हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न किया  जिस कारण इस देवी को कुष्मांडा नाम से जाना जाने लगा।
माता कूष्माण्डा की - आठ भुजाएं है |
माता कूष्माण्डा के सात हाथो में - कमण्डल ,धनुष, बाण,कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं।
माता कूष्माण्डा के आठवे हाथ में - जप माला है |
माता कूष्माण्डा की प्रिय बलि - कुम्हड़े की है |
माता कूष्माण्डा का वाहन - सिंह है |
माता कूष्माण्डा का वास स्थल सूर्यमंडल के  है। सूर्यलोक में रहने की  क्षमता केवल इन्हीं में है।  इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है।
माता कूष्माण्डा आधियों-व्याधियों से मुक्त करती हैं और अपने भक्तो को सुख समृद्धि और उन्नति प्रदान करती हैं।  
 
माता कूष्माण्डा मंत्र
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे।
 
सोमवार २५ सितम्बर २०१७
स्कंदमाता

नवरात्रि में पंचमी के दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है |
स्कंदमाता की भुजाएं - चार है |
दाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में -  स्कंद यानी कार्तिकेय को गोद में बिठा रखा है |
दाईं तरफ के नीचे वाले हाथ में - कमल का फूल है |
बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में - वरदमुद्रा में है |
स्कंदमाता का वाहन - सिंह है |
 स्कंदमाता की उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। भक्त को मोक्ष प्राप्त होता है | जो भक्त मन को एकाग्र रखकर और पवित्र रखकर स्कंदमाता की  आराधना करता है उसे  भवसागर पार करने में कठिनाई नहीं आती है।
 यह देवी विद्वानों और सेवकों को पैदा करने वाली शक्ति है। यानी चेतना का निर्माण करने वालीं।  ये कहा जाता है की कालिदास द्वारा रचित जो रघुवंशम महाकाव्य और मेघदूत रचनाएं  है वो स्कंदमाता की कृपा से ही संभव हुईं है |
 
स्कन्द माता मंत्र
सिंहसनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
 शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥
 
मंगलवार २६ सितम्बर २०१७
माता  कात्यायनी

नवरात्रि के षष्ठी के दिन माता  कात्यायनी की पूजा की जाती है। जो भक्त माता कात्यायनी की  उपासना और आराधना करते है उन्हें बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फल प्राप्त हो जाते है | कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की आराधना  की तथा  कठिन तपस्या की। उनकी ये अभिलाषा थी कि उन्हें पुत्री प्राप्त हो।इसी माता भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया।जिस कारण यह देवी कात्यायनी कहलाईं। इनकी कृपा से सारे कार्य पूर्ण हो जाते हैं।ब्रज की गोपियां भगवान कृष्ण को पति के रूप में पाना चाहती थी जिसके के लिए उन्होंने माता कात्यायनी की पूजा की थी | गोपियों ने यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की थी | इसीलिए माता कात्यायनी ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
माता कात्यायनी का स्वरूप - स्वर्ण के समान चमकीली हैं और भास्वर हैं।
 माता कात्यायनी की -  चार भुजाएं है |
दायीं तरफ का ऊपर वाला हाथ - अभयमुद्रा में है |
नीचे वाला हाथ -  वर मुद्रा में है।
माता  के बाँयी तरफ के ऊपर वाले हाथ -  में तलवार है |
 नीचे वाले हाथ मे  - कमल का फूल सुशोभित है।
माता कात्यायनी का वाहन - सिंह है।
माता कात्यायनी की उपासना करने वालो के  रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं, जन्मों के समस्त पाप से  भी मुक्ति मिल जाती है |  इसलिए कहा जाता है कि इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है।
 
माता कात्यायनी मंत्र
चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
 कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

बुधवार २७ सितम्बर २०१७
माता कालरात्रि

नवरात्रि के सप्तमी के दिन माता कालरात्रि की पूजा की जाती है | माता कालरात्रि के नाम लेने से सारी असुरी शक्ति दूर भागने लगती है | माता दुर्गा की सातवीं शक्ति माँ कालरात्रि के नाम से जानी जाती है | माँ कालरात्रि के नाम से ही ये जाहिर है कि इनका रूप भयानक है।

माँ कालरात्रि के शरीर का रंग - घोर अंधकार की भाति  एकदम काला है।
माँ कालरात्रि के केश - बिखरे हुए है |
माँ कालरात्रि के गले में - महा मुंडो की माला है |
माँ कालरात्रि के -तीन नेत्र है जो ब्रह्मांड  के समान गोल है |
माँ कालरात्रि का वाहन - गर्दभ है |
दाईं तरफ का ऊपर वाला हाथ - वरमुद्रा में है |
दाईं तरफ का नीचे वाला हाथ -  अभय मुद्रा में है।
बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में - लोहे का कांटा है |
बाईं तरफ के नीचे वाले हाथ में - खड्ग है |

माता कालरात्रि अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं |  यही शक्ति काल से भी रक्षा करती है | माता कालरात्रि जब सांस लेती है तो इनकी  सांसों से अग्नि निकलती रहती है।माँ कालरात्रि का  रूप भले ही भयंकर हो लेकिन यह सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं। इसीलिए इन्हे शुभंकरी कहा जाता है |  अर्थात इनसे भक्तों को किसी भी प्रकार से भयभीत होने या डरने की कोई आवश्यकता नहीं है । माँ के साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है।
माँ कालरात्रि के स्मरण से ही दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत भाग जाते हैं। यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि ये सारे के सारे भय दूर हो जाते हैं।माता की कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।

माँ कालरात्रि मंत्र
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
 लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
 वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
 वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

ब्रस्पतिवार २८ सितम्बर २०१७ 
 माता महागौरी 
 
माता महागौरी माँ दुर्गा की आठवीं शक्ति है। नवरात्री में अष्टमी के दिन महागौरी की उपासना की जाती है | माता महागौरी  अमोघ फलदायिनी हैं इनकी  उपासना से भक्तो के पूर्वसंचित पाप नष्ट हो जाते हैं। महागौरी की  पूजा-अर्चना, उपासना-आराधना कल्याणकारी है।महागौरी की  कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं।इनके नाम से ही  प्रकट होता है कि इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा चंद्र, शंख, और कुंद के फूल से दी गई है।  महागौरी  की आयु आठ साल मानी गई है।
 
माता महागौरी की -  सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं।
माता महागौरी की - 4 भुजाएं हैं | 
माता महागौरी का वाहन -  वृषभ है | 
दाईं तरफ का ऊपर वाला हाथ - अभय मुद्रा में है | 
दाईं तरफ का नीचे वाले हाथ में - त्रिशूल धारण किया हुआ है।
बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में - डमरू धारण कर रखा है | 
बाईं तरफ का नीचे वाला हाथ - वर मुद्रा में  है।
 
 माता महागौरी को श्वेताम्बरधरा भी कहा गया है।  इनकी पूरी मुद्रा बहुत ही  शांत है।शिव को पति के  रूप में  प्राप्त करने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी। जिसके कारण इनका शरीर काला पड़ गया था |  भगवान शिव ने माता महागौरी की तपस्या से प्रसन्न होकर इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर कांतिमय बना दिया था । जिस कारण इनका  रूप गौर वर्ण का हो गया इसीलिए यह महागौरी कहलाईं |  
 
माता  महागौरी मंत्र 
श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
 
शुक्रवार २९ सितम्बर २०१७
माता सिद्धिदात्री
 
माता  सिद्धिदात्री माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति है नवरात्री के नवमी के दिन इन्हीं माता की पूजा-अर्चना की जाती है |नवमी के दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ माता सिद्धिदात्री की साधना करने वाले साधक  को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है।
भगवान शंकर ने भी माता सिद्धिदात्री  की कृपा से तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। माता सिद्धिदात्री की कृपा  से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए। हिमाचल के नंदापर्वत परमाता सिद्धिदात्री का प्रसिद्ध तीर्थ है।महिमा, अणिमा,  लघिमा,गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियां होती हैं।माता सिद्धिदात्री की सच्चे मन से विधि विधान से उपासना-आराधना करने से यह सभी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं।
माता सिद्धिदात्री के
 
दाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में - गदा है |
दाईं तरफ के नीचे वाले हाथ में - चक्र है |
बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में - कमल पुष्प है |
बाईं तरफ के नीचे वाले हाथ में - शंख है |
माता सिद्धिदात्री का वाहन - सिंह है |
 
माता सिद्धिदात्री कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। यह माँ दुर्गा का अंतिम स्वरूप है , इनकी साधना करने से लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाये पूर्ण हो जाती है | माता सिद्धिदात्री का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और हमे  अमृत पद की ओर ले जाते हैं।
 
माता सिद्धिदात्री मंत्र
सिद्धगन्‍धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि |
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी | |
 
 
नवरात्रि पर संदेश
In Hindi

लक्ष्मी का हाथ हो ,
सरस्वती का साथ हो ,
गणेश का निवास हो ,
और माँ दुर्गा का आशीर्वाद हो ,
नवरात्रि की शुभकामनाएं ,

रेशम का हार ,
सावन की सुगंध ,
बारिश की फुहार ,
राधा की उम्मीदें ,
कन्हैया का प्यार ,
मुबारक हो आपको नवरात्रि का त्यौहार ,

सारा जहाँ है जिसकी शरण में ,
नमन है उस माता के चरण में ,
बने उस माता के चरणों की धूल ,
आओ मिलकर चढ़ाये श्रद्धा के फूल ,
नवरात्रि की शुभकामनाये ,

माँ की ज्योति से प्रेम मिलता है ,
सबको दिलो को मर्म मिलता है ,
जो भी जाता है माँ के द्वार ,
कुछ न कुछ जरुर मिलता है ,
नवरात्रि की शुभकामनाये ,

चाँद की चाँदनी ,बसंत की बहार ,
फूलों की खुशबू ,अपनों का प्यार
मुबारक हो आपको नवरात्रि त्यौहार ,
जगत पालन हार है माँ ,
मुक्ति का धाम है माँ ,
हमारी भक्ति का आधार है माँ ,
हम सब की रक्षा की अवतार है माँ ,

कभी न हो आपका ,
दुःखों से सामना ,
पग - पग में माँ दुर्गा का ,
का आशीर्वाद मिले ,
यही है हमारी तरफ से ,
नवरात्रि की शुभकामना ,

शेरा वाली मैया के दरबार में,
सारे दुःख दर्द मिटाये जाते है,
जो भी द्वार पर आते है ,
शरण में ले लिए जाते है,
नवरात्रि की शुभकामनाये ,
 
नवरात्रि पर संदेश

In English
May the great wishes of Goddesses
Give you strength and smiles
May you live with peace and joy
A successful mile after mile

Dandiya raas and lot of fun
the festivities of Navratri have begun
May you be blessed with peace and love
By Maa durga from heaven above
Happy Navratri.

It’s the special time of Navratri
and I don’t want to miss a chance to say
you mean to me more than you
enjoy your Navratri today.

On this individual day of Navratri
I want you to know I miss you today
May Maa bring us together again
Sending wishes and love your way
Happy Navratri

नवरात्रि गीत

दोहा : दरबार तेरा दरबारों में,
एक ख़ास एहमियत रखता है ।
उसको वैसा मिल जाता है,
जो जैसी नियत रखता है ॥
बड़ा प्यारा सजा है द्वार भवानी ।
भक्तों की लगी है कतार भवानी ॥
ऊँचे पर्बत भवन निराला ।
आ के शीश निवावे संसार, भवानी ॥
प्यारा सजा है द्वार भवानी ॥
जगमग जगमग ज्योत जगे है ।
तेरे चरणों में गंगा की धार, भवानी ॥
तेरे भक्तों की लगी है कतार, भवानी ॥
लाल चुनरिया लाल लाल चूड़ा ।
गले लाल फूलों के सोहे हार, भवानी ॥
प्यारा सजा है द्वार, भवानी ॥
सावन महीना मैया झूला झूले ।
देखो रूप कंजको का धार भवानी ॥
प्यारा सजा है द्वार भवानी ॥
पल में भरती झोली खाली ।
तेरे खुले दया के भण्डार, भवानी ॥
तेरे भक्तों की लगी है कतार, भवानी ॥


 

 

Diwali day of celebration - Thursday
Date - 19 October 2017 in Delhi
 
दिवाली भारत का एकक महत्वपूर्ण त्यौहार है ! दिवाली से पहले सभी लोग पूरे घर की साफ सफाई व् रंग रोगन करवाते है ! मान्यता है कि इस दिन माँ लक्ष्मी सभी घरों में पधारती है और जिस घर में साफ सफाई और शांति का स्थापत्य होता है माँ लक्ष्मी उस उस घर में विराजमान रहती है ! अर्थात उस घर में धन सम्पत्ति और मान सम्मान की सदैव के लिए स्थाईवास हो जाता है !
 
कब आरम्भ हुआ दिवाली का त्यौहार
दिवाली त्यौहार का आरम्भ श्री राम के १४ साल के वनवास के बाद माता सीता, लक्षमण सहित हनुमान और अन्य लोगों के घर वापसी पर अयोध्या के लोगों ने अपने घरों में घी के दीपक जलाये थे और उसी परंपरा को बरकरार रखते हुए आज भी हम सभी अपने घरों में दिए जलाकर इस त्यौहार को मानते है !
 
 

Ganesh Chaturthi 2017 will begin on
Friday, 25 August
and ends on
Tuesday, 5 September


गणेश चतुर्थी
 
गणेश चतुर्थी का त्यौहार बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है | यह त्यौहार भारत के विभिन्न भागो में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है | लेकिन महाराष्ट राज्य में यह त्यौहार और भी धूमधाम से मनाया जाता है | पुराणों और ग्रंथो के अनुसार इस दिन यानी चतुर्थी के दिन गणेश जी का जन्म हुआ था | गणेश चतुर्थी के दिन सभी भक्त बड़ी ही श्रद्धा से पूजा -अर्चना करते है | गणेश चतुर्थी के दिन विभिन्न जगहों में तथा घरो में गणेश जी की मूर्ती स्थापित की जाती है | और उसे पूरे नौ दिन तक बड़े ही श्रद्धा भाव से पूजा जाता है | गणेश जी के दर्शन करने के लिए भारी संख्या में आस -पास के लोग इकट्ठा होते है | नौ दिन पूरे होने  के बाद गाने -बाजे और ढोल -नगाड़ो के साथ गणेश जी की प्रतिमा को तालाब में विसर्जित कर  दिया जाता है |
 
गणेश चतुर्थी की कथाये


एक बार माता पार्वती स्नान करने गयी तो उन्होंने  स्नान करने से पूर्व उपटन लगाया और उस उपटन के  मैल से एक बालक की प्रतिमा बनाकर   उसे अपना द्वारपाल बना दिया। शिवजी जब प्रवेश कर रहे थे  तब बालक ने उन्हें रोक दिया।शिवगणो ने जब यह देखा  की एक बालक ने शिवजी का अपमान किया है तो उनसे यह देखा न गया और उन्होंने  बालक से भयंकर युद्ध किया परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया। इससे माता पार्वती क्रोधित हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली। भयभीत देवताओं ने देवर्षिनारद की सलाह पर माता की  स्तुति कर तथा भगवान शंकर के ये कहने की वह उस बालक को पुनर्जीवित कर देंगे इससे माता पार्वती को  शांत किया। शिवजी के निर्देश पर विष्णुजी उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुखबालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्यहोने का वरदान दिया। भगवान शंकर ने बालक से कहा-गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा।
 
गणेश चौथ की कथा
 
गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रदर्शन करना मना  होता है क्योकि कहते है की श्री कृष्ण ने चौथ का चाँद देख लिया था  जिस कारण उनपर मणि चुराने का आरोप लगा था | एक बार जरासंध के भय से श्रीकृष्ण समुद्र के बीच नगरी बसाकर रहने लगे। इस नगरी को द्वारिकापुरी के नाम से जाना जाता है । द्वारिकापुरी में सत्राजित यादव नाम का राजा रहता था जिसने सूर्य देव की आराधना की।  जिससे सूर्य देव प्रसन्न हो गए तब भगवान सूर्य ने उसे नित्य आठ भार सोना देने वाली स्यमन्तक नामक मणि अपने गले से उतारकर दे दी।  मणि पाकर सत्राजित  बहुत प्रसन्न हुआ और  जब  वह नगरी में गया तो सब उसकी मणि को ही देख रहे थे  | श्रीकृष्ण ने उस मणि को देखा और उसे प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। सत्राजित ने वह मणि श्रीकृष्ण को देने से इनकार कर दिया और अपने भाई  प्रसेनजित को दे दी। एक दिन प्रसेनजित घोड़े पर बैठकर शिकार के लिए गया। वहां पर एक  शेर था जिसने  उसे मार डाला और मणि ले ली। रीछों का राजा जामवन्त उस सिंह को मारकर मणि लेकर गुफा में चला गया।  जब प्रसेनजित  कई दिनों तक शिकार से नहीं  लौटे तो सत्राजित को बहुत दुख हुआ।और उन्होंने  सोचा की श्रीकृष्ण ने  मणि प्राप्त करने के लिए उसके भाई प्रसेनजित का वध कर दिया । अतः उसने बिना सत्य को जाने नगर  में प्रचार कर दिया की श्री कृष्ण ने उसके भाई को मरकर स्यमन्तक मणि छीन ली | इस निंदा के निवारण हेतु  श्रीकृष्ण  प्रसेनजित को ढूंढने वन में गए। वहां पर प्रसेनजित को शेर द्वारा मार डालना और शेर को रीछ द्वारा मारने के चिह्न उन्हें मिल गए।
रीछ के पैरों के निशान का पीछा  करते-करते वे जामवन्त की गुफा में पहुंचे और गुफा के भीतर चले गए।  और वहां उन्होंने देखा कि पलने में एक बच्ची  लेती है और उसके हाथो में मणि है जिसे वह खिलौना समझ कर खेल रही है |
जामवन्त ने श्रीकृष्ण को देखते ही  युद्ध छेड़ दिया | श्रीकृष्ण के साथी जो उनके साथ गए थे वो गुफा के बाहर ही श्री कृष्ण की प्रतिक्षा कर रहे थे जब श्री कृष्ण   सात दिनों तक वापस नहीं लौटे तो उनके साथियो ने उन्हें मरा  हुआ जानकर वापस द्वारिकापुरी को लौट गए।गुफा के अंदर लगातार इक्कीस दिन तक युद्ध चला लेकिन इतने दिनों तक युद्ध करने के बाद भी जामवन्त श्री कृष्ण को पराजित न कर सका।तब उसके मन में विचार आया की कहीं यह वह अवतार तो नहीं है   जिसके लिए मुझे श्री  रामचंद्रजी का वरदान मिला था।इस बात की पुष्टि हो जाने पर उसने अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में दे दी। जब श्रीकृष्ण  मणि लेकर वापस आए तो सत्राजित को अपने किए पर बहुत लज्जा आई  तथा  पछतावा  हुआ। इस लज्जा से मुक्त होने के लिए उसने अपनी पुत्री सत्यभामा  का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।कुछ समय व्यतीत होने के बाद श्रीकृष्णको  किसी काम से इंद्रप्रस्थ जाना पड़ा |  तब ऋतु वर्मा तथा अक्रूर के कहने पर शतधन्वा यादव ने सत्राजित को मार दिया और मणि अपने कब्जे में ले ली।जब  सत्राजित की मृत्यु  का समाचार  श्रीकृष्ण को मिला तो  वे तत्काल द्वारिका पहुंचे।जब शतधन्वा को यह बात पता चली की श्री कृष्ण और बलराम उसे मारने के लिए तैयार हो गए है तो शतधन्वा ने मणि अक्रूर को दे दी और स्वयं भाग निकला। श्रीकृष्ण नेशतधन्वा को ढूढ़ लिया और उसे मार दिया पर मणि को हासिल नहीं कर पाए कुछ समय बाद बलरामजी भी वहां पहुंचे।तब  श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि मणि शतधन्वा के पास नहीं थी।लेकिन बलराम जी को  श्री कृष्ण की बातो में   विशवास नहीं हुआ | तथा वे अप्रसन्न होकर विदर्भ चले गए।जब श्रीकृष्ण द्वारिका को लौटे तो  लोगों ने उनका भारी अपमान किया। तुरंत पूरी द्वारका नगरी में यह समाचार फैल गया कि स्यमन्तक मणि के लोभ में श्रीकृष्ण ने अपने भाई बलराम  को भी त्याग दिया। श्रीकृष्ण का जिस तरह अपमान हुआ उसके कारण वह शोक में  डूबे थे कि अचानक वहां नारदजी आ गए। उन्होंने श्रीकृष्णजी को बताया की आपने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चंद्रमा का दर्शन किया था जिस  कारण आपको इस तरह लांछित होन | श्रीकृष्ण ने नारद जी से पूछा की चौथ के चंद्रमा को ऐसा क्या हो गया है जिससे उसके दर्शन करने से मनुष्य कलंकित होता है? तब नारदजी ने उत्तर दिया की  एक बार ब्रह्माजी ने चतुर्थी के दिन गणेशजी का व्रत किया था। गणेशजी नेप्रशन्न होकर  वर मांगने को कहा तो उन्होंने मांगा कि मुझे सृष्टि की रचना करने का कोई मोह न रहे | जैसे ही गणेशजी तथास्तु कहकर जाने लगे  तो  उनके विचित्र व्यक्तित्व को देखकर चंद्रमा ने उनका  उपहास किया।जिस कारण गणेशजी ने.रुष्ट होकर चंद्रमा को श्राप दिया कि आज से कोई तुम्हारा मुख नहीं देखना चाहेगा।  श्राप  देकर गणेशजी अपने लोक को चले गए और चंद्रमा मानसरोवर की कुमुदिनियों में जाकर छिप गया | चंद्रमा के बिना सारे प्राणियों को बड़ा ही  कष्ट हुआ। उनके कष्ट को देखकरसारे देवताओं ने ब्रह्मा जी से आज्ञा लेकर गणेश जी का व्रत किया और जिससे गणेश जी प्रसन्न हो गए और उन्होंने वरदान दिया  कि अब से चंद्रमा श्राप से मुक्त तो हो जाएगा, पर भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को जो भी चंद्रमा के दर्शन करेगा उसे चोरी का झूठा लांछन जरूर लगेगा। और उन्होंने कहा की जो मनुष्य प्रत्येक द्वितीया को चंद्र  दर्शन.करता रहेगा  वह इस लांछन से बच जाएगा। इस चतुर्थी के दिन  सिद्धिविनायक व्रत करने से सारे दोष छूट जाएंगे।इस बात को सुनकर सारे देवता अपने -अपने   स्थान को चले गए। नारद जी कहते है इसलिए  भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा का दर्शन करने से आपको यह कलंक लगा है। तब श्रीकृष्ण ने कलंक से मुक्ति पाने के लिए यही व्रत किया था।कुरुक्षेत्र के युद्ध में युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था की भगवन मनुष्य  की मनोकामना सिद्धि का कौन-सा उपाय है?वह  किस प्रकार  धन, पुत्र, सौभाग्य तथा विजय प्राप्त कर सकता है?इस बात का श्री कृष्ण ने उत्तर दिया की यदि तुम  श्री गणेश का विधिपूर्वक पूजन करोगे तो निश्चय ही तुम्हें सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। तब श्रीकृष्ण की आज्ञा से ही युधिष्ठिरजी ने गणेश चतुर्थी का व्रतकरके महाभारत का युद्ध जीता था।

गणेश चतुर्थी सन्देश 
In Hindi
 
गणेश जी का रूप निराला है ,
चेहरा भी कितना भोला -भाला है ,
जिस पर भी आई है मुसीबत ,
उसे इन्होने ही तो संभाला है ,
गणेश चतुर्थी मुबारक हो ,
 
आपके  सुख गणेश के पेट जितने बड़े हो,
आपके दुःख उदर जैसे छोटे  हो,
आपका जीवन गणेश जी की सूंड जितना बड़ा हो,
आपके बोल मोदक जैसे मीठे हो,
गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाये ,
 
आपका और खुशियों का जनम -जनम का साथ हो ,
आप की तरक्की की  हर किसी की ज़ुबान पर बात हो ,
जब भी कोई मुश्किल आये ,
मेरा दोस्त गणेशा हमेशा आप के साथ हो ,
गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाये ,
 
गणेश की ज्योति से नूर मिलता है ,
सबके हृदय को सुरूर मिलता है ,
जो भी जाता है गणेश के द्वार ,
कुछ न कुछ ज़रूर मिलता है ,
जय श्री गणेश ,
 
पार्वती पुत्र गणेश की कृपा ,
बनी रहे आप पर हर दम ,
प्रत्येक कार्य में सफलता मिले ,
जीवन भर न हो कोई गम 
गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर ,
आओ सब मिलकर गजानन को करे नमन ,
हर कोई हो स्नेह से बंधा ,
मन की भक्ति को हम सब कर दे अर्पण ,
 
सुखी जीवन हो ,हो अच्छे विचार ,
यही है हमारा मानना ,
कभी न आये दुखो के पल ,
ये हमारी तरफ से ,
गणेश चतुर्थी के पर्व पर है शुभकामना ,
 
एक दो तीन चार ,
गणपति जी की जय-जय कार ,
पांच, छै ,सात, आठ ,
गणपती जी है सबके साथ ,
फूल की शुरुआत कली से होती है ,
जिंदगी की शुरुआत प्यार से होती है ,
प्यार की शुरुआत अपनों से होती है ,
और अपनों की शुरुआत आप से होती है ,
गणेश चतुर्थी मुबारक हो ,
 
गणपति जी का स्वागत करो ,
 खुशियों से अपनी झोली भरो ,
अगले बरस फिर आना ,
ये कहकर उनको विदा करो ,
 जय श्री गणेश ,
 
आपकी हमारे जीवन में ,
अहमियत  कुछ ख़ास है ,
और जंहा स्नेह और प्रेम हो ,
वंही गणेश जी का वास है ,
गणेश चतुर्थी के मनोरंजक सन्देश 
 
आदमी नदी में डूब  रहा था बोला -गजानन बचाओ ,
गजानन नाचने लगे ,
आदमी आप नाच क्यों रहे हो ?
गजानन मेरे विसर्जन पर तू भी तो बहुत नाचा था ,
 
पति - काश मैं गणपति होता ,
तुम मेरी रोज पूजा करती ,
मुझे लड्डू खिलाती ,
बड़ा ही आनंद आता ,
पत्नी - हां  काश तुम गणपति होते ,
रोज तुमको लड्डू खिलाती ,
हर साल विसर्जन करती ,
नए गणपति आते ,
बड़ा ही आनंद आता ,
 
शंकर जी मेरा त्रिशूल कहाँ गया ?
पार्वती जी आज गणेश ले गया है ,
शंकर जी  ने पूछा क्यों ?
पार्वती जी बोली की ,
आज किसी ने मैगी का भोग लगाया है | 
 
पड़ोसी : माता जी आप बार बार,
घर के अंदर बाहर कर रही है, 
कोई समस्या है क्या ?
माता जी : नहीं बेटा ,
मेरी बहु टीवी देखकर योगा कर रही है ,
उसमे बाबा जी कह रहे की ,
सास को अंदर करो सास को बाहर करो | 

Ganesh chaturthi sms

 In English

 

May the demolisher of sin,

Grace you with peace and love,

And blessings be showered upon you,

From heaven up above,

Happy Ganesh Chaturthi.

 

Have a happy and successful life

May all your dreams come true

May both day of life begin

With blessings of Ganesha for you.

Happy Ganesh Chaturthi.

 

God come to you in various forms

And blesses you in disguise

Happy Ganesh Chaturthi to you

Celebrate the God powerful yet wise.

 

Its the positive day of Lord Ganesh

Begin your journey from the start

Be good and make good

Just truthfully keep playing your part

Happy Ganesh Chaturthi.

 

On this favorable occasion of Ganesh utsav

Make a wish and it shall come true

Because Ganesha is the lord of trust

Who is forever study you.

 

May the gloom reduce

May there be glow

May loved once never go

Out of spectacle

May success and Joy always stay

Wish you a Happy Ganesh chaturthi.

 

The year of good chance and fun

With blessings of Ganesha has just begin

The lord may bless you in every way

This is my only request today.

 

A fresh sunrise, a new start

Oh lord Ganesha, stay loving me as your part.

Happy Ganesh Chaturthi.

Hartalika Teej 

Day - Thursday
Date 24 August 2017

यह हरतालिका व्रत सबसे पहले पार्वती जी ने शकंर जी को पति के रूप में पाने के लिए लिया था ! इस व्रत का नाम हरत + आलिका दो शब्दों से मिलकर बना है ! हरत का मतलब हरण करना और आलिका सखियों को दर्शता है !
इस व्रत में पार्वती जी स्वयंमेव इच्छा से अपने सखियों द्वारा हर ली गई थी ! और उस समय ही उन्होंने यह हरतालिका व्रत किया था ! 

Hartalika teej story in hindi

सती रूप के बाद माँ पार्वती के रूप में हिमालय के घर जन्मी ! जन्म के बाद थोड़ी बड़ी होने पर ही उन्होंने भगवन शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठिन तप प्रारम्भ कर दिया !
उनके ऐसे कठिन तप को देख हिमवान विचार में पड़ गए कि इस कन्या के लिए वे वर किसको चुने ?
एक दिन जब किसी कारण वश नारद जी जब उनके महल में पधारे तो उन्होंने अपनी चिंता उनसे बतलाई ! तो नारद ने उन्हें उनकी पुत्री के लिए श्री हरी विष्णु का नाम सुझा दिया !

अब यह प्रस्ताव् सुन हिमवान बहुत खुश हुए पर जब पार्वती जी को पता चला तो वः बहुत दुखी हो गई ! और उन्होंने अपनी सखी से शरीर त्यागने की बात कही !
उनकी सखियों ने उन्हें समझाया और कहा कि वे उन्हें हर कर किसी एकांत जगह में पंहुचा देंगी जहाँ वह भगवन शंकर की कठिन उपासना कर उन्हें प्रसन्न कर सके !
और पार्वती जी ने उस वन में निर्जल व्रत कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और भगवान शिव ने माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया !

Hartalika vrat vidhi

हरतालिका व्रत विधि

हरतालिका व्रत का प्रहर शाम और रात के मध्य प्रदोष काल को माना जाता है ! इस समय ही इस व्रत का उचित समय आरम्भ होता है ! मिटटी से शिव परिवार की मूरत बनाते है ! शिव पार्वती के साथ गणेश जी की पूजा होती है !
फूलों का छत्र बना कर उसके नीचे रंगोली सजाई जाती है ! उस रंगोली पर चौकी बिछा कर उस पर सातिया डाल कर थाल सजाया जाता है ! फिर थाल पर केले के पत्ते को रख मूर्ति स्थापित की जाती है !
फिर एक कलश के मुंह पर कलावा बांध कर उस पर कलावा बंधा श्रीफल रख दिया जलाते है !
घड़े पर सातिया बना कर अक्षत चढ़ाते है !
कलश का पूजन कर फूल माला, हल्दी, कुमकुम, और सिक्का दक्षिणे में चढ़ाते है !
सर्वप्रथम शिव जी की पूजा फिर माता पार्वती की पूजा कर श्रृंगार सामग्री चढ़ाते है !
खीर नैवैद्य में डालते है !
आरती कर पूजा संपन्न करते है !
यह व्रत सभी स्त्रियां निर्जला रह कर करती है ! दूसरे दिन सभी सामग्री को निर्माल्य में डाल देते है !

Hartalika teej Vrat Samagri

Mitti 
Sindur
Ganga jal
Kumkum
Bhagwan ke kapde
Suhag ka saman
Aasan
Lal Kapda
Roli
Moli
Mithaiyan
kapoor
Chandan
vrati ke naye kapde
Fruits
Flowers
Dhoop
Milk
Dahi
Ghee
Shakkar
Shahad
Sukhe meve



 

 

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